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देश टूट रहा है कुछ करो

जरा विवशता देखिए देश की महँगाई आम आदमी को तोड़ रही हैं और चिंता सिर्फ राजनीतिक लोगों को है। उत्तर पूर्व में देश से अलग होने के आंदोलन जोरों पर हैं पर चिंता सिर्फ सरकार को है। गुर्जर आंदोलन हो या कुछ भी हम सिर्फ मूक गवाह बन कर देखते रहते है। क्या सिर्फ हमारा जन्म साक्षी बनने का है? हम क्यों कुछ नहीं करते? सहीं सोच रहे हैं, आप हम कर ही क्या सकते हैं? बिल्कुल यही सोच हमारी नहीं सारी देश की है। क्या कोई संगठन नहीं बन सकता जो सिर्फ जनता का हो जिसे राजनीतिक मजबूरी के चलते किसी बात का विरोध न करना पड़े बल्कि वह सिर्फ जनता का हो। मीडिया सिर्फ विज्ञापन पर चलता है। इसके अलावा छोटे मोटे दल किसी न किसी पार्टी से जुड़े हैं। किसी से आशा करना व्यर्थ हैं, तो इन सबका हल यही दिखता है कि कोई संगठन हो। आज इंटरनेट के कारण लोग बिना डर के लिख रहे हैं, मिल रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है यह भी बौद्धिक व्यायाम ही है। किसी के बारे में लिखें ठीक हैं लेकिन कुछ एक्शन भी लेना चाहिए। माध्यम भले ही ऑनलाइन मिले लेकिन किसी तरह से आवाज तो उठाए।
हमें यह समझना चाहिए लोकतंत्र हो या कानून या पुलिस या जो भी सभी कुछ सिद्धांतरुप में बड़े बेहतर बनाए गए हैं लेकिन लोग इनका सही उपयोग नहीं जानते। हमें यह कोशिश करना चाहिए की हम किसी तरह सही जानकारी लोगों तक पहुँचाए। मुझे लगता है मेरे ब्लाँग से ही सही लोग अपनी परेशानियाँ सामने रखे उसका समाधान भी हम अपने दूसरे लेखकों से निकलवाएं। लोगों की समस्याएं इतनी बड़ी नहीं हैं बस कमी हैं तो सही ज्ञान की क्योंकि गुलामी के दौर से सरकारों की ओर ही देखते आए हैं, हमें लगता है कि हमें केवल सरकार ही उबार सकती हैं लेकिन यकीन मानिए लोगों की समस्याएँ केवल वोट के
आधार पर ही सरकार को नजर आती हैं। तो कुछ करने का समय हैं। यह वक्त हैं जो करोड़ो भारतीय पिछे छूटते जा रहे हैं। हमें ही कुछ करना होगा नहीं तो यह आनलाइन मीडिया भी काल्पनिक संसार में गोते लगाते कविताएं कहानियाँ और गजल कहते सुनते ही बर्बाद हो जाएगा।
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